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धार्मिक उत्साह के साथ आज अमावस्या के दिन मनाया गया पोला उत्सव।

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धार्मिक उत्साह के साथ आज अमावस्या के दिन मनाया गया पोला उत्सव।

बैलों को सजाकर पूजा अर्चना कर मंदिरों के कराऐ दर्शन ।

खंडवा। ओला अमावस्या के दिन नगर के साथ ही गांवो में भी बैलों को सजाकर उनकी पूजा कर उन्हें मंदिर के दर्शन कराए गए। भरत की यह पावन भूमि भारत संस्कृति और धर्म पर आधारित है और यहां त्यौहारों के साथ नागपंचमी पर जहां नागदेवता की पूजा कर दूध पिलाया जाता है वहीं पोला अमावस्या के दिन बैलों की पूजा का भी विशेष महत्व है। इस दिन किसानों द्वारा खेतों में हल चलने वाले बैलों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए विशेष रूप से पूजा की जाती है। इसी के साथ विभिन्न कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है। जिसमें बच्चों से लेकर हर वर्ग के लोग उत्साहपूर्वक शिरकत करते हैं। समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि पोला अमावस्या के दिन बाजार से मिट्टी के बैल लाकर उनकी घरों में पूजा की गई। पोला उत्सव का अपना अलग ही महत्व है। पोला पर्व को भगवान शंकर की सवारी नंदी बैल से भी जोड़कर देखा जाता है। कहा जाता है कि स्वामी भक्त नंदी की पूजा होती है। भारत को कृषि प्रधान देश माना गया है इसलिए यह पर्व यहां खास तौर पर मनाने की पुरानी परंपरा है। क्षत्रपति शिवाजी के वंशज पोला पर्व को दिवाली की तरह मनाते हैं। पोला पर्व पर किसान अपने बैलों को नहला धुलाकर सजा-संवार कर पूजा अर्चना पश्चात् जिले के गांवों में किसान अपने बैलों को मैदान में ले जाते हैं जहां बैलों की दौड़ होती है। ग्रामीण अंचलों के कई स्थानों पर यह परंपरा आज भी जीवित है और पूरे उत्साह के साथ बैल दौड़ का आयोजन किया जाता है। इस दिन ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी के बने बैल बर्तन बच्चों को खेलने के लिए दिए जाते हैं। वैसे तो यह परंपरा महाराष्ट्र प्रांत में बड़े ही धार्मिक उल्लास के साथ पोला उत्सव के रूप में मनाई जाती है लेकिन धीरे-धीरे से इसका चलन अन्य प्रांतों में भी हो रहा है। महाराष्ट्र से लगे खंडवा में महाष्ट्रीयन, यादव एवं थीठे परिवारों के साथ अन्य सामाजिक बंधुओ के द्वारा यह पोला उत्सव भादव मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। इस दिन घरों में पुरनपुली बनाई जाती है वहीं सुबह से ही अपने बैलों को नहला-दुहलाकर उनको मेंहदी लगाकर सजाया जाता है। पुष्पमाला पहनाई जाती है और दोपहर बाद ढोल-ढमाकों के साथ बैलों का अपने-अपने निवास से परिवार सहित शहर के मंदिरों के साथ ही हनुमान जी के मंदिर ले जाकर वहां श्रीफल चढ़ाकर पूजा अर्चना की गई एवं बैलों को तिलक लगाकर भगवान के दर्शन सिर झुकाकर कराए गए। समाजसेवी सुनील जैन ने बताया कि खंडवा में वर्षो से पदमकुंड स्थित आव्हाड़ परिवार, संजय नगर एवं कुंडलेश्वर वार्ड में थिटे बंधु परिवार, पड़ावा क्षेत्र मालीकुआ क्षेत्र में यादव परिवार के साथ ही महाराष्ट्रीयन परिवार एवं किसान भाई बैलों को अपने परिवार का सदस्य मानकर उनकी पूजा अर्चना कर उन्हें घर में बनाए भोजन की प्रसादी भी ग्रहण कराई। शनिवार को पोला अमावस्या पर शहर के दादा दरबार, सराफा स्थित गणेश मंदिर पड़ावा पर हनुमान मंदिर, बजरंग चौक स्थित मुनिबाबा एवं हनुमान मंदिर, शनि मंदिर पर ढोल-ढमाकों के साथ बैलों को सजाकर मंदिर ले जाया गया।

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